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अपोजी-2010 : एक वर्णन
“सफर का साथ है ये मंज़िलों का साथ नहीं गुज़र ही जायेंगे लम्हे हिसाब रहने दो” जब भी अपने पहले अपोजी के बारे में सोचता हूँ तो ये पंक्तियाँ अनायास ही मन में कौंध जाती हैं | वो 5 दिन यूँ बीत गए कि पता ही न चला | जब अपोजी के बारे में पहली &hellip Continue reading
